"मेरे जीवन में हमेशा बुजुर्गों के लिए एक विशेष सम्मान और स्नेह रहा है। मेरी शादी के कुछ वर्षों बाद मेरे पिताजी का निधन हो गया। उनके जाने के बाद मेरी माँ मेरे जीवन का सबसे बड़ा सहारा बन गईं। मैंने अपने ससुरजी को कभी नहीं देखा था, इसलिए मैं अपनी सासू माँ का विशेष ध्यान रखती थी और उन्हें अपनी माँ के समान मानती थी।
मेरी सासू माँ ने बहुत कम उम्र में अपने पति को खो दिया था। उनके सबसे छोटे बच्चे की उम्र उस समय केवल डेढ़ महीने थी। इतनी कठिन परिस्थिति में भी उन्होंने धैर्य, साहस और प्रेम से अपने बच्चों का पालन-पोषण किया। उनके जीवन से मैंने सीखा कि परिवार की जिम्मेदारियाँ कैसे निभाई जाती हैं और कठिन समय में भी सकारात्मक कैसे रहा जाता है।
घर में उनकी देखभाल के लिए सभी सुविधाएँ उपलब्ध थीं और अलग से सहायिका भी थी, लेकिन मुझे स्वयं उनकी सेवा करने में खुशी मिलती थी। मैं रोज़ उनके सिर में तेल लगाती थी क्योंकि इससे उन्हें आराम मिलता था। कई लोग कहते थे कि यह काम तो सहायिका भी कर सकती है, लेकिन मेरे लिए यह केवल एक काम नहीं था, बल्कि प्रेम और सम्मान व्यक्त करने का माध्यम था।
मैंने अपनी माँ और सासू माँ दोनों की सेवा को ईश्वर की पूजा के समान माना। उनसे मिले संस्कार, धैर्य और जीवन मूल्यों ने मुझे बेहतर इंसान बनाया। आज मैं जो भी हूँ, उसमें उनके आशीर्वाद और शिक्षाओं का बहुत बड़ा योगदान है। उनकी सीख ने मुझे यह समझाया कि सच्चा सुख और सफलता केवल उपलब्धियों में नहीं, बल्कि अपने बड़ों के प्रति प्रेम, सम्मान और सेवा में भी छिपी होती है।"