"जब मेरी शादी हुई, तब मेरी उम्र केवल 19 वर्ष थी और मैं बी.कॉम. के अंतिम वर्ष में पढ़ रही थी। शादी फरवरी में हो गई और मार्च में होने वाली परीक्षा भी मैं नहीं दे पाई। पढ़ाई के बाद सीधे एक बड़े संयुक्त परिवार में आना मेरे लिए बिल्कुल नया अनुभव था।
घर में माता-पिता, चाचा-चाची, रिश्तेदार और परिवार के कई सदस्य थे। मुझे घर के कामकाज का बहुत कम अनुभव था क्योंकि मेरा पूरा ध्यान पढ़ाई पर रहा था। शुरू-शुरू में हर काम को लेकर घबराहट रहती थी। जब घर के बड़े कोई काम बताते, तो मैं पूरी कोशिश करती, लेकिन कई बार साधारण चीज़ों के नाम और तरीके भी मुझे नहीं पता होते थे।
ऐसे समय में मेरे ससुरजी ने मेरा बहुत साथ दिया। वे समझते थे कि मुझे धीरे-धीरे सीखने की आवश्यकता है। कई बार ऐसी मज़ेदार परिस्थितियाँ बन जाती थीं जब मैं किसी वस्तु या घरेलू शब्द का अर्थ नहीं समझ पाती थी। तब परिवार के लोग धैर्यपूर्वक मुझे समझाते और मैं सीखती जाती।
हमारे घर में अनुशासन और परंपराओं का विशेष महत्व था। भोजन समय पर और विशेष तरीके से बनाया जाता था। परिवार के बड़ों की पसंद और आवश्यकताओं का ध्यान रखना भी सीखने का हिस्सा था। उस समय घर में सुविधाएँ सीमित थीं और अधिकांश काम हाथ से करने पड़ते थे, इसलिए मेहनत और जिम्मेदारी दोनों अधिक थीं।
आज पीछे मुड़कर देखती हूँ तो महसूस होता है कि यदि उस समय मैंने अधीरता, नाराज़गी या शिकायत का रास्ता चुना होता, तो शायद मैं इतना कुछ नहीं सीख पाती। धैर्य, सम्मान और सीखने की इच्छा ने मुझे हर परिस्थिति में स्वयं को ढालना सिखाया।
मेरे जीवन की सबसे बड़ी सीख यही है कि परिवार और जीवन की चुनौतियों को धैर्य के साथ स्वीकार करना चाहिए। बड़ों के अनुभवों से सीखकर और परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढालकर हम हर जगह सफलतापूर्वक रह सकते हैं।"