"""मैं बचपन में 4 साल का था तब मेरे पिताजी गुजर गए थे। हम लोग 7-8 भाई-बहन थे। उसमें हम 6 भाई-बहन बोर्डिंग में पढ़ के गए थे। बहुत स्ट्रगल किया हमने। मेरी तीन बहनें बड़ौदा में जाती थीं और हम लोग नवसारी में पढ़े थे। हमारी पोजीशन इतनी खराब थी कि हमको तीन-तीन साल बम्बई आने को नहीं मिलता था। उस टाइम तो ट्रेन का किराया भी 7-8 रुपये था, लेकिन वो भी हम नहीं भुगत सकते थे।
उसके बाद हम जब यहाँ पे आते थे सब भाई-बहन, तो हमारी परिस्थिति इतनी खराब थी कि हमको खाने-पीने के भी फांफे थे। हम हमारे ऊपर के घर वालों के वहाँ जाते थे, खाना खा लेते थे, कैसे भी दिन गुजारा कर लेते थे।
उसके बाद जब मैं बड़ा हुआ, तब मैं नौकरी पे लगा। थोड़ा सक्सेस मिला। उसके बाद शादी हुई, शादी के बाद भी मैंने सर्विस किया, सब कुछ किया, बिजनेस किया, लेकिन उसमें भी सक्सेस नहीं मिला। उसके बाद मैंने बिजनेस किया थोड़ा-थोड़ा, उसमें भी सक्सेस नहीं मिला। लेकिन आज जब मेरे बच्चे थोड़े बड़े हो गए हैं, तो थोड़ा सक्सेस मिला है और मैं सुख से जीवन गुजार रहा हूँ।"""