"मैं कैलाश बहेती, राजस्थान के चित्तौड़गढ़ जिले के एक छोटे से गाँव से हूँ। यह कहानी तब की है जब मैं लगभग सोलह वर्ष का था। हमारा परिवार व्यवसाय से जुड़ा था, लेकिन मेरे पिताजी वकालत करते थे और राष्ट्रीय एवं सामाजिक कार्यों में सक्रिय रहते थे।
आपातकाल के दौरान पिताजी को जेल जाना पड़ा। उस समय परिवार के लिए परिस्थितियाँ बहुत कठिन हो गईं। गाँव में लोग हमसे दूरी बनाने लगे, कोई खुलकर साथ नहीं देता था और परिवार को सामाजिक तथा आर्थिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा। कई रिश्तेदारों ने भी यह कहकर हाथ खींच लिया कि अब हमें अपनी राह स्वयं बनानी होगी।
उस समय मैं पढ़ाई कर रहा था। कम उम्र होने के बावजूद मैंने परिवार की जिम्मेदारियों को समझा और पढ़ाई के साथ-साथ छोटे-मोटे काम करना शुरू किया। मेरा लक्ष्य था कि परिस्थितियाँ चाहे जैसी हों, शिक्षा नहीं छोड़नी है।
जब पिताजी जेल से वापस आए, तब मैंने अपनी पढ़ाई पूरी की। मैं व्यवसाय में जाना चाहता था, लेकिन पिताजी का मानना था कि शिक्षा सबसे बड़ा निवेश है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि कठिनाइयों के बावजूद पढ़ाई जारी रखनी चाहिए। आर्थिक संसाधन सीमित थे, फिर भी उन्होंने मुझे आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया।
उनकी सीख, संघर्ष के दिनों का अनुभव और शिक्षा के प्रति उनका विश्वास मेरे जीवन की दिशा बन गया। आज पीछे मुड़कर देखने पर महसूस होता है कि कठिन समय ने मुझे आत्मनिर्भर, जिम्मेदार और दृढ़ बनाया। जीवन की सबसे बड़ी सीख यही है कि संघर्ष स्थायी नहीं होते, लेकिन उनसे मिली सीख जीवनभर साथ रहती है।"