"हमारे पिताजी, लाला रामगोपाल जी, गायों के प्रति अत्यंत प्रेम और करुणा रखते थे। वे हमेशा गौशाला में प्रत्येक गाय की देखभाल का ध्यान रखते थे—चारे, पानी और उनकी अन्य आवश्यकताओं की व्यवस्था स्वयं देखते थे।
एक बार गर्मियों के दिनों में किसी ने उन्हें बताया कि गौशाला की गायें पानी की कमी से परेशान हैं। यह सुनते ही उन्होंने तुरंत समाधान खोजने का निश्चय किया। उन्होंने ऐसी जगह की पहचान करवाई जहाँ पानी की व्यवस्था की जा सके, वहाँ खुदाई करवाई और पानी की सुविधा उपलब्ध करवाई। जब उन्होंने गायों को दौड़कर पानी पीते देखा, तो उन्हें अत्यंत संतोष और आनंद मिला। इस घटना ने उनके सेवा-भाव और संवेदनशीलता को और भी स्पष्ट किया।
उनका जीवन केवल पशु-सेवा तक सीमित नहीं था। जहाँ भी उन्हें किसी आवश्यकता का पता चलता, वे उसे पूरा करने का प्रयास करते। जब उन्होंने महसूस किया कि दृष्टिबाधित बच्चों के लिए उचित व्यवस्था नहीं है, तो उन्होंने मंगोलपुरी में एक अंध आश्रम की स्थापना में योगदान दिया, ताकि बच्चे सुरक्षित वातावरण में रह सकें, प्रशिक्षण प्राप्त कर सकें और आत्मनिर्भर बन सकें।
इसी प्रकार, जहाँ चिकित्सा सुविधाओं की कमी थी, वहाँ उन्होंने लोगों के लिए दवाइयों और उपचार की व्यवस्था कराने में सहयोग दिया। शिक्षा, स्वास्थ्य और समाज सेवा के क्षेत्र में वे सदैव सक्रिय रहे। उनका मानना था कि यदि हमारे पास किसी की मदद करने की क्षमता है, तो उसका उपयोग समाज के कल्याण के लिए होना चाहिए।
उनके कार्यों ने हमें सिखाया कि जीवन का वास्तविक उद्देश्य केवल स्वयं के लिए जीना नहीं, बल्कि दूसरों के जीवन में भी सकारात्मक परिवर्तन लाना है। सेवा, करुणा और समाज के प्रति उत्तरदायित्व ही उनकी सबसे बड़ी विरासत है।"